बहुनेह किमुक्तेन चोर्ध्वाम्नायपरस्य च । स्मरणं कीर्त्तनं वापि दर्शनं वन्दनं तथा । सम्भाषणञ्च कुरुते राजसूयाधिकं फलम् ॥
बहुत कहने से क्या लाभ? ऊर्ध्वाम्नाय परायण साधक को स्मरण, कीर्तन, अभिवन्दन, सम्भाषण करने से राजसूय से भी अधिक फल मिलता है।
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