सुपक्वेषु पदार्थेषु सुरसेषु कुलेश्वरि । लवणेन विना स्वादु यथा भोक्तुर्न जायते ॥
पराप्रासादमन्त्रेण ये वा मन्त्रा न सङ्गताः । ते फलं न प्रयच्छन्ति मन्त्रं शक्तिविवर्जिताः ॥
हे कुलेश्वरि! जिस प्रकार अच्छे पके हुये, रसीले पदार्थों में नमक के बिना खाने वाले को स्वाद नहीं मिलता, उसी प्रकार जो मन्त्र पराप्रासादमन्त्र से सङ्गत नहीं हैं, वे मन्त्रशक्ति से रहित होकर फल नहीं देते।
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