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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 39
पराप्रासादमन्त्रेण स्यूतमेतच्चराचरम् । अभिन्नं तत्त्वतो देवि तालवृन्ते यथानिलः ॥ बीजेऽ‌ङ्कुरस्तिले तैलमग्नावुष्णं रवौ प्रभा । चन्द्रे ज्योत्स्नाऽनलः काष्ठे पुष्पे गन्धे जले द्रवः ॥ शब्दे चार्थः शिवे शक्तिः क्षीरे सर्पिः फले रुचिः। शर्करायाञ्च माधुर्यं घनसारे च शीतलम् ॥ निग्रहानुग्रहो मन्त्रे प्रतिमायाञ्च देवता । दर्पणे प्रतिबिम्बञ्श्च समीरे चलनं यथा । पराप्रसादमन्त्रेऽपि प्रपञ्चोऽयं तथा स्थितः ॥
'पराप्रासादमन्त्र' से यह चराचर जगत् व्याप्त है। हे देवि! तत्त्वतः ये दोनों अभिन्न हैं, उसी प्रकार जैसे तालवृन्त में वायु, बीज में अंकुर, तिल में तैल, अग्नि में ऊष्णता, सूर्य में प्रकाश, चन्द्रमा में चाँदनी, लकड़ी में अग्नि, पुष्प में गन्ध, जल में द्रवता, शब्द में अर्थ, शिव में शक्ति, दूध में घी, फल में स्वाद, शर्करा में मिठास, चन्दन में ठण्डक, मन्त्र में निग्रह और अनुग्रह, मूर्ति में देवता, दर्पण में प्रतिबिम्ब और वायु में गति के समान विद्यमान है। प्रासादमन्त्र में यह प्रपञ्च भी उसी प्रकार स्थित है।
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