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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 31
मन्त्रयोगं विदुः पूर्वं भक्तियोगञ्च दक्षिणम् । पश्चिमं कर्मयोगञ्च ज्ञानयोगं तथोत्तरम् ॥
दूसरे प्रकार से पूर्वाम्नाय मन्त्रयोग है और दक्षिणाम्नाय भक्तियोग है। पश्चिमाम्नाय कर्मयोग है और उत्तराम्नाय ज्ञानयोग है।
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