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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 44
सहस्त्राक्षादयो देवाः शास्त्रेषु विविधेषु च । भ्रमन्ति तेषु मूढास्ते तव मायाविमोहिताः ॥ जायन्ते च प्रियन्ते च संसारक्लेशभागिनः । श्रीप्रासादपरामन्त्रं न गायन्तः कुलेश्वरि । न लभन्ते हि मोक्षं ते तव मायाविमोहिताः ॥
इन्द्रादि देवता आपकी माया से मोहित होकर विविध शास्त्रों में प्रमित होते रहते हैं और संसार के कष्टों में पड़कर जन्म लेते व मरते रहते हैं किन्तु आपकी माया से मोहित होकर वे, हे कुलेश्वरि! श्रीप्रासाद परामन्त्र का गान नहीं करते और मोक्ष को नहीं प्राप्त करते।
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