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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 37
शिवादिक्रिमिपर्यन्तं प्राणिनां प्राणवर्मना । निश्वासोच्छ्‌वासरूपेण मन्त्रोऽयं वत्र्त्तते प्रिये ॥
हे प्रिये! शिव से कृमि तक सभी प्राणियों में प्राणवायु के मार्ग से निःश्वास उच्छवास के रूप में यह मन्त्र विद्यमान रहता है।
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