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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 72
द्विशतं यो जपेद्देवि श्रीप्रासादपरामनुम् । चतुरशीतिलक्षांशधारणाचरितैरपि ॥ स्वयोनिजाङ्गवरितैरसंख्यजननार्जितैः । वार्द्धके यौवने बाल्ये जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ॥ कर्मणा मनसा वाचा ज्ञानाज्ञानकृतैरपि । महापातकसंघैश्च ह्युपपातककोटिभिः । मुच्यते नात्र सन्देहः सत्यमेतद्वरानने ॥
हे देवी! श्रीप्रासादपरामन्त्र को दो सौ बार जो जप करता है, वह पिछले चौरासी लाख योनियों के अपने विविध एवं असंख्य जीवनों की बाल्य, यौवन, वृद्धावस्था में, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति दशाओं में मन, वचन, कर्म से ज्ञान या अज्ञानपूर्वक किये गये समस्त महापापों एवं करोड़ों उपपाप समूहों से छूटकारा पा जाता है, इसमें सन्देह नहीं है, हे वरानने! यह सत्य है।
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