आम्नायमीदृशं देवि विजानाति च तत्त्वतः । स वन्द्यः सद्गुरुः सोऽर्च्यः स दैवज्ञः स मान्त्रिकः । स सेव्यः स च संस्तुत्यः स द्रष्टव्यः स सात्त्विकः ॥
स व्रती स तपस्वी च सोऽनुष्ठाता स पूजकः । स वेदागमशास्त्रादिसर्वविद्याविशारदः ॥
स आचार्यः स मतिमान् स यतिः स च कौलिकः । स यज्वा स च पूतात्मा स जापी स च साधकः ॥
स योगी स कृतार्थस्तु स वीरः स च उत्तमः । स पुण्यात्मा स सर्वज्ञः स मुक्तः स शिवः प्रिये ॥
हे देवि! इस ऊर्ध्वाम्नाय को जो तत्त्वतः जानता है वह सबका वन्दनीय, सद्गुरु, पूजनीय, दैवज्ञ, मान्त्रिक, सेवनीय, स्तुत्य, दर्शनीय, सात्विक, व्रती, तपस्वी, अनुष्ठाता, पूजक, वेदागम शास्त्रादि सब विद्याओं में विशारद, आचार्य, बुद्धिमान् यति, कौलिक, याज्ञिक, पूतात्मा, (मन्त्र) जापी, साधक, योगी, उत्तम, वीर, पुण्यात्मा, सर्वज्ञ और सब कुछ होकर कृतार्थ हो जाता है और हे प्रिये! वह मुक्त होकर शिवस्वरूप होता है।
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