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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 62
चिरेणैकैकफलदा मन्त्राः सन्ति सहस्रशः । कुलेशि मन्त्रराजोऽयं शीघ्रं सर्वफलप्रदः ॥
सहस्रों प्रचलित मन्त्रों में से प्रत्येक मन्त्र पर्याप्त विलम्ब से और केवल एक ही फल प्रदान करते हैं। किन्तु हे कुलेशि! यह मन्त्रराज शीघ्र ही सर्व फलों को प्रदान करता है।
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