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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 18
देवतानां यथा विष्णुज्योतिषां भास्करो यथा । तीर्थानान्तु यथा काशी स्वर्नदी सरितां यथा ॥ पर्वतानां यथा मेरुस्तरूणां चन्दनं यथा । अश्वमेधः क्रतूनाञ्च पाषाणानां यथा मणिः ॥ यथा रसानां माधुर्यं धातूनां काञ्चनं यथा । चतुष्पदां यथा धेनुर्यथा हंसस्तु पक्षिणाम् ॥ आश्रमाणां यथा भिक्षुर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा । मनुष्याणां यथा राजाऽवयवानां यथा शिरः ॥ आमोदानाञ्च कस्तूरी यथा काञ्चीपुरी पुराम् । तथैव सर्वधर्माणामूर्ध्वाम्नायोऽधिकः प्रिये ॥
देवों में जैसे विष्णु, ज्योतियों (नक्षत्रों) में जैसे सूर्य, तीर्थों में जैसे काशी, नदियों में जैसे गङ्गा, पर्वतों में जैसे मेरु, वृक्षों में जैसे चन्दन, यज्ञों में जैसे अश्वमेध, पत्थरों में जैसे मणि, रसों में जैसे मधुरता, धातुओं में जैसे स्वर्ण, पशुओं में जैसे गाय, पक्षियों में जैसे हंस, आश्रमों में जैसे भिक्षु, वर्षों में जैसे ब्राह्मण, मनुष्यों में जैसे राजा, अङ्गों में जैसे शिर, सुगन्धियों में जैसे कस्तूरी और पुरियों में जैसे काशी श्रेष्ठ है, वैसे ही हे प्रिये! सब धर्मों में ऊर्ध्वाम्नाय की श्रेष्ठता है।
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