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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 53
मन्त्रमात्रन्तु यो वेत्ति पराप्रासादसंज्ञकम् । श्वपचोऽपि हि मुच्येत किं पुनस्तद्विधानवित् ॥
केवल पराप्रासाद नामक मन्त्र को जो साधक जानता है, वह चाण्डाल भी मुक्त हो जाता है, तब इस मन्त्र के जपादि विधि विधान को जानने वाले की तो बात ही क्या है।
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