हे कुलेश्वरि! यह अरूप, भावनागम्य, परंब्रह्म, निष्कल, निर्मल, नित्य, निर्गुण, आकाशवत् अनन्त, अव्यय और मनवाणी से परे है। इस पराप्रासाद का अर्थ केवल ध्यान से ही प्रकाशित होता है।
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