मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 65
पराप्रासादमन्त्रोऽयं तस्मात् सर्वात्मको भवेत् ॥ पराप्रासादमन्त्र का सर्वात्मकत्व - अतः यह पराप्रासादमन्त्र सर्वात्मक है। अरूपं भावनागम्यं परं ब्रह्म कुलेश्वरि । निष्कलं निर्मलं नित्यं निर्गुणं व्योमसन्निभम् ॥ अनन्तमव्ययं तत्त्वं मनोवाचामगोचरम् । पराप्रासादमन्त्रार्थसन्धानात् सम्प्रकाशते ॥
हे कुलेश्वरि! यह अरूप, भावनागम्य, परंब्रह्म, निष्कल, निर्मल, नित्य, निर्गुण, आकाशवत् अनन्त, अव्यय और मनवाणी से परे है। इस पराप्रासाद का अर्थ केवल ध्यान से ही प्रकाशित होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें