गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा ।
पराप्रासादमन्त्रोऽयं देवेशि न च निष्फलः ॥
चाहे चलते हुये जप करे या बैठे हुये, चाहे जागते हुये जप करे या सोते हुये, यह पराप्रासादमन्त्र हे देवेशि! कभी निष्फल नहीं होता।
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