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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 46
पूर्वजन्मसहस्त्रेषु शैवादिसमयोद्यतान् । चतुराम्नायजान् मन्त्रान् गुर्वाज्ञां यो भजिष्यति ॥ स पापकञ्चकान्मुक्तः शुद्धात्मा गुरुवत्सलः । श्रीप्रासादपरामन्त्रं विजानाति न चान्यथा ॥
सहस्रों पूर्वजन्मों में शैवादि समयों (धर्मों) का पालन करते हुये गुरु की आज्ञा से चार आम्नायों के मन्त्रों की जो उपासना करता है, वह पापशरीर से मुक्त होकर शुद्धात्मा और गुरु का प्रिय होता है और वही श्रीप्रासादपरामन्त्र को जान पाता है, दूसरा नहीं।
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