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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 5
मम पञ्चमुखेभ्यश्च पञ्चाम्नायाः समुद्गताः । पूर्वश्च पश्चिमश्चैव दक्षिणश्चोत्तरस्तथा । ऊर्ध्वाम्नायश्च पञ्चैते मोक्षमार्गाः प्रकीर्त्तिताः ॥
मैंने अपने पाँच मुखों से - १. पूर्वाम्नाय, २. पश्चिमाम्नाय, ३. दक्षिणाम्नाय, ४. उत्तराम्नाय और ५. ऊर्ध्वाम्नाय - ये पाँच आम्नाय कहे हैं। ये पाँचों मोक्षमार्ग के प्रवर्तक शास्त्र हैं।
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