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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 15
ऊर्ध्वतत्त्वात् कुलेशानि ध्वस्तसंसारसागरात् । ऊर्ध्वलोकैकसेव्यत्वादूर्ध्वाम्नाय इति स्मृतः ॥
हे कुलेशानि! इसका तत्त्व उच्च स्तर का है, संसारसागर (के मोह) को यह नष्ट करता है और ऊर्ध्व लोक इसकी सेवा करते हैं। अतएव यह 'ऊर्ध्वाम्नाय' कहलाता है।
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