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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 74
चतुःशतं जपेद् यस्तु श्रीप्रासादपरामनुम् । सदा तस्य गृहद्वारे ह्यणिमाद्यष्टसिद्धयः । सेवन्ते नात्र सन्देहः सर्वसिद्धिसमन्विताः ॥ यद् यन्मनोऽभिलषितं तत्तत् प्राप्नोत्यसंशयः । धर्मार्थकाममोक्षाश्च साक्षात्तस्य करे स्थिताः ॥ सालोक्यप्रमुखां देवि लभेन्मुक्तिं चतुर्विधाम् । सत्यमेतन्न सन्देहः साधकः कुलनायिके ॥
श्री प्रासादपरामन्त्र को चार सौ बार जो जप करता है, उसके द्वार पर अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ सब सिद्धियों सहित सेवा करती हैं और जो भी उसकी मनोकामना होती है, वह निःसन्देह पूर्ण होती है। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष साक्षात् उसके हाथ में स्थित है और हे देवि! सालोक्य सारूप्य आदि चारों प्रकार की मुक्ति वह प्राप्त करता है। हे कुलनायिके! साधक को इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए, यह सत्य है।
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