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अध्याय 14 — चतुर्दशोल्लासः
कुलार्णव
88 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! मैं गुरु और शिष्य की परीक्षा के सम्बन्ध में सुनना चाहती हूँ। साथ ही उपदेश का क्रम और दीक्षा के भेद भी मुझे बताइये।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने मुझसे पूछा है, उसे मैं बताऊँगा, जिसके सुनने मात्र से चित्त की शुद्धि होती है।
शिव के शासन में यह कहा गया है कि दीक्षा के बिना साधक का मोक्ष नहीं होता और वह दीक्षा आचार्य परम्परा के बिना नहीं होती।
अतः सम्प्रदाय आदि साधनों से सिद्धान्त को जान कर आन्तरिक उपदेश देने वाले को प्राप्त करे, अन्यथा मन्त्र निष्फल होते हैं। परम्परा के प्रवर्तक, मन्त्र और आगम के ज्ञाता और समयाचार के पालन करने वाले गुरु को ही देवता मानते हैं।
शिव की आज्ञा से विरक्त होते हुये भी गुरु कुछ समय में शिष्य के अधिकार को समझकर उसे अधिकार देते हैं।
गुरु द्वारा अधिकार पाने वाले शिष्य को साक्षात् परशिव से 'योग' की प्राप्ति होती है और देहान्त होने पर उसे शाश्वत मोक्ष मिलता है, यह शङ्कर का वचन है।
अतः हे प्रिये! सब प्रयत्न करके साक्षात् परशिव द्वारा निर्दिष्ट सम्प्रदाय को गुरु सदा अग्रसर करता रहे।
शक्ति की सिद्धि को सुनिश्चित करने के लिये गुरु विधिपूर्वक शिष्य की परीक्षा लेकर तब उसे उपदेश करे अन्यथा मन्त्र निष्फल होता है।
जो अन्याय से मन्त्र देता है और जो अन्याय से लेता है, हे देवि! वे मन्त्रदाता और मन्त्र प्राप्तकर्ता दोनों ही कुलशाप को प्राप्त करते हैं।
यदि कोई गुरु और शिष्य मोहवश एक दूसरे की परीक्षा लिये बिना ही उपदेश देते और लेते है, तो वे दोनों ही पिशाच होते हैं।
अशास्त्रीय उपदेश को जो देते लेते हैं, वे दोनों ही अनेक वर्षों तक घोर नरक में वास करते है।
जो असंस्कृत उपदेश देता है, वह पापी है और उसका मन्त्र बालू में शालि (धान) के बीज के समान नष्ट होता है।
अयोग्य के पास मन्त्र विज्ञान कभी नहीं ठहरता, अतः परीक्षा लेकर ही उपदेश करे, अन्यथा निष्फल होता है।
समयदीक्षा कर समयपादुका देकर शिष्य को अपने पास बैठाकर मन्त्र कहे, अन्यथा मन्त्र न कहे।
अत्यन्त भक्त, सत्शिष्य को जो ज्ञानोपदेश किया जाता है, वह ज्ञान अखण्ड शास्त्रार्थ का विधायक होता है किन्तु भक्तिहीन, असत् शिष्य को जो ज्ञान दिया जाता है, वह कुत्ते द्वारा स्पृष्ट गोदुग्ध के समान अपवित्र होता है।
धन की इच्छा, भय एवं लोभादि से यदि अयोग्य को दीक्षा दी जाती है, तो वह निष्फल होती है और देवता का शाप मिलता है।
शिष्य के ज्ञान और क्रिया दोनों को परीक्षा एक वर्ष तक या छः मास तक या तीन मास तक गुरु यत्न करके ले।
प्राण (जीवन), द्रव्य (धन) एवं प्रणामादि आदेशों द्वारा निम्न कर्मों में उत्तम और उत्तम कर्मों में निम्न क्रियाएँ गुरु स्वयं करे।
उन कर्मों के सूचक वाक्यों, मायाओं, क्रूर चेष्टाओं द्वारा पक्षपात और उदासीनता से बारम्बार शिष्य को आकृष्ट करे और ताड़ित होकर भी जो शिष्य दुःखी न हों, अपितु सदा प्रसन्न होकर यही सोचें कि 'गुरु कृपा कर रहे हैं' और श्रीगुरु का स्मरण, कीर्तन, दर्शन, वन्दन, परिचर्या एवं आज्ञा पालनादि करने में जिन्हें रोमाञ्च, कम्प, गद्गद् स्वर, डबडबाते नेत्रादि के साथ आनन्द का अनुभव हो, वे शिष्य इस दीक्षासंस्कार कर्म के योग्य हैं।
शिष्य भी निम्न गुणों से युक्त गुरु कीं परीक्षा करके ही शिष्य बने। जप, स्तोत्र, ध्यान, होम एवं पूजन आदि के करने में जिसे आनन्द मिलता हो, ज्ञानोपदेश करने को सामर्थ्य जिसमें हो और हे ईश्वरि! जिसमें मन्त्रसिद्धि और वेधकत्व का परिज्ञान हो - इन लक्षणों से गुरु को पहचान कर शिष्य बने, अन्यथा नहीं।
हे देवि! आदि (आरम्भ), मध्य और अवसान (अन्त) में शक्ति-निपात के योग्य तीन प्रकार के शिष्य क्रमशः १. अधम, २. मध्यम और ३. श्रेष्ठ कहे गये हैं।
जिन्हें आरम्भ में भक्ति होती है, जो दीक्षा के लिये उत्सुक होते हैं और दीक्षा पाकर अति हर्षित होते हैं । वे 'आदियोग्य' शिष्य कहे गए है।
मध्य योग्य वे हैं, जो दीक्षा के समय में आकर ज्ञान अथवा अज्ञान से रहित होकर जो भक्ति द्वारा संशयहीन होते हैं, वे शिष्य 'मध्यमयोग्य' कहे गए हैं।
अन्त योग्य (श्रेष्ठ) जो नर आदि में भक्तिहीन रहकर मध्य में भक्तिमान हो अन्त में अति भक्त होते हैं वे 'अन्तयोग्य' शिष्य होते हैं।
हे प्रिये! १. उत्तम कर्म, २. धर्म और ३. ज्ञान - ये तीन भेद उपदेश के हैं।
जैसे चींटी धीरे-धीरे वृक्ष के ऊपर लगे फल तक चिरकाल में पहुँचती है वैसा ही कर्म का उपदेश माना गया है।
हे प्रिये! जैसे बन्दर यत्नपूर्वक एक डाली से दूसरी डाली को पारकर फल को प्राप्त करता है, वैसा ही क्रम धर्म के उपदेश का है।
हे कुलनायिके! जैसे आकाशगामी शीघ्र ही फल तक पहुँच जाता है, वैसे ही ज्ञानोपदेश की महिमा कही गई है।
हे महेश्वरि! हे देवि! कर्म से रहित दीक्षा तीन प्रकार की है - १. स्पर्श, २. दृक् और ३. मानस।
जैसे चिड़िया अपने पंखों से बच्चों को धीरे-धीरे पालती है, हे प्रिये! 'स्पर्शदीक्षा' भी वैसी ही कही गई है।
अपने बच्चों को जैसे मछली केवल देखकर ही पालती है, हे परमेश्वरि! उसी प्रकार 'दृग्दीक्षा' का उपदेश है।
जैसे कछुई (कच्छपी) अपने बच्चों का पालन केवल ध्यान द्वारा करती है, उसी प्रकार मानस 'वेधदीक्षा' का उपदेश होता है।
शक्तिपात की मात्रा के अनुसार शिष्य पर अनुग्रह करे। जिस पर शक्तिपात नहीं होता, उसे सिद्धि नहीं मिलती।
हे देवि! मोक्ष प्रदान करने बाली दीक्षा सात प्रकार कही गई है - १. क्रिया, २. वर्ण, ३. कला, ४. स्पर्श, ५. वागू, ६. दृङ् और ७. मानस संज्ञक है। इनके विशेष नाम क्रमशः ये हैं - १. समया, २. साधिका, ३. पुत्रिका, ४. वेधका, ५. पूर्णा, ६. चर्चा और ७. निर्वाण।
कुण्ड, मण्डप और कलश आदि से युक्त 'क्रियादीक्षा' आठ प्रकार की है, जिसे बाहापूजा विधि से गुरु को करना चाहिये। हे देवेशि! पूर्वोक्त विधि का देह शुद्धि के लिए आचरण करना चाहिए। 'वर्णदीक्षा' ४२, ५० या ६२ अक्षरों के (न्यास के) भेद से तीन प्रकार की है।
हे प्रिये! इस दीक्षा में शिष्य के शरीर में वर्णों का न्यास कर प्रतिलोम से उन्हें लय कर शिष्य के चैतन्य को परमात्मा से युक्त करे।
पुनः उन वर्णों को उससे उत्पत्र कर शिष्य के शरीर में उनका न्यास करे और सृष्टिक्रम की विधि से चैतन्यं को प्रयुक्त करे।
इस प्रकार शिष्य में देवभाव उत्पन्न होकर वह परानन्दमय होता है। हे प्रिये! यह वर्णमयी दीक्षा पाशों को काटने वाली (पापहारिणी) कही गई हैं।
हे प्रिये! 'कलादीक्षा' तीन प्रकार की है, जिसे विधिवत् करे। १. पैरों के तलवे से लेकर घुटनों तक 'निवृत्ति', २. घुटनों से नाभि तक 'प्रतिष्ठा', ३. नाभि के कण्ठ तक 'विद्या', ४. कण्ठ से ललाट तक 'शान्ति', ५. ललाट से शिर तक 'शान्त्यतीता' - ये पाँच कलाएँ स्थित हैं। यही कलाएँ 'कलाव्याप्ति' नाम से जानी जाती है।
हे प्रिये! संहार क्रम के योग से एक स्थान से दूसरे स्थान में उक्त कलाओं के अनुक्रम के अनुसार शिरपर्यन्त विधिवत् संयोजन किया जाता है। हे कुलेशानि! इससे शिष्य को दिव्यभाव प्राप्त होता है।
अथवा हे देवि! ३८ या ५० कलाओं से तत्त्वन्यास के क्रम से सृष्टि संहार मार्ग से गुरुमुख से जानकर शिष्य में संयोजन कर वेधन करे।
इससे देवभाव उत्पन्न होकर योगिनी-वीर के मिलन का आनन्द मिलता है। यह 'कलादीक्षा' पशुपाशों को नष्ट करने वाली कही गई है।
श्री गुरुदेव अपने हाथ में शिव का ध्यान कर मूलाङ्गमालिनी का जप कर शिष्य के शरीर का स्पर्श करे। यह 'स्पर्शदीक्षा' है।
अपने चित्त को तत्त्व में स्थित कर परतत्त्व से उत्प्रेरित होकर गुरु संहत रूप से मन्त्रोपदेश करे। यह 'वागदीक्षा' है।
दोनों आँखें बन्द कर परत्तत्त्व का ध्यान करते हुये प्रसन्नबुद्धि से गुरुदेव शिष्य को अच्छी तरह देखें। हे प्रिये! यह 'दृग्दीक्षा' होती है।
गुरु के दर्शन, भाषण, स्पर्श मात्र से जब शिष्य को तुरन्त ज्ञान होता है, तो वह 'शाम्भवी दीक्षा' मानी जाती है।
'मनोदीक्षा' १. तीव्रा और २. तीव्रतरा दो प्रकार की है। हे प्रिये! शिष्य के शरीर में १. भुवन, २. तत्त्व, ३. कला, ४. वर्ण, ५. पद, ६. मन्त्र - इन छः अध्वानों का स्मरण करते हुए क्रमशः १. जानु, २. नाभि, ३. हृदय, ४. कण्ठ, ५. तालु और ६. मूर्द्धा में हे अम्बिके! गुरुपदिष्ट मार्ग से वेध करे।
इससे क्षण मात्र में ही शिष्य पापों से मुक्त होकर उसी समय परानन्दमय को प्राप्त होता है। हे कुलेश्वरि! हे देवि! यह मुक्तिप्रदा 'तीव्रदीक्षा' कही गई है।
'तीव्रतरा दीक्षा' में गुरु के द्वारा स्मृतिमात्र से सम्यक् रूप से संवेधित होकर शिष्य उसी समय पापमुक्त हो जाता है और बाह्य क्रियाओं से शून्य होकर पृथ्वी पर तुरन्त गिर पड़ता है। हे शाम्भवि! दिव्यभाव को प्राप्त कर वह सर्वज्ञ हो जाता है। वेधकाल में जो होता है, उसे वह स्वयं ही अनुभव करता है। हे ईश्वरि! प्रबुद्ध होने पर उस सुख का वर्णन करने में वह समर्थ नहीं हो पाता।
इस प्रकार वेधविद्ध शिष्य साक्षात् शिव होता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यह संसार के बन्धन से छुड़ाने वाली 'तीव्रतरा दीक्षा' है। यह साक्षात शिवभाव प्रदान करती है। हे कुलनायिके! इस प्रकार से मैं आपसे दृढ़तापूर्वक कहता हूँ।
हे कुलेश्वरि! वेध की छः अवस्थायें कही गई हैं - १. आनन्द, २. कम्प, ३. उद्भव, ४. घूर्णा, ५. निद्रा और ६. मूर्च्छा। वेध दीक्षा होने पर शिष्य में ये ६ गुण दिखाई पड़ते हैं। हे कुलेश्वरि! बेधित जहाँ कहीं भी रहे, मुक्त रहता है, इसमें सन्देह नहीं।
हे प्रिये! वेधदीक्षा करने वाला गुरु संसार में दुर्लभ है, वैसा शिष्य भी दुर्लभ है, पुण्ययोग से ही मिलता है। अतः हे परमेश्वरि! यह दीक्षा जिस किसी को न दे, ऐसी आज्ञा है।
हे देवि! कुलद्रव्यों से सविधि कुलचक्र पूजा कर शिष्य को उसे दिखाए, यह 'कौलिकी दीक्षा' है।
पञ्चगव्यामृत से युक्त कुलद्रव्य को मुख में भरकर गुरुदेव गण्डूष (कुल्ला) द्वारा शिष्य का अभिषेक करें।
हे प्रिये! तब सजीव मीन से युक्त सुरा या पञ्चामृत से पूर्ण शङ्ख द्वारा या कलश के द्वारा बाह्य अभिषेक करें।
हे देवि! 'मीन' लम्बिका (जिह्वा) है और 'कलश' मुख को कहा है। इस प्रकार पञ्चगव्यामृत से पूर्ण मुख द्वारा शिष्य का अभिषेक करे। हे पार्वति! यह सिद्धाभिषेक है और आचार्य के लिये भी वाञ्छनीय है।
१-३. तीनों समय दन्तधावन, ४-६. तीनों समय पुष्पाञ्जलि, ७. शङ्खोदक से अभिषेक और ८. वेधन - इस प्रकार आठ क्रियायें हैं। फिर १. शङ्खाभिषेक, २. बोधन, ३. वेध, ४. पूर्णाभिषेक और ५. आचार्य - ये पाँच अवस्थायें कही गई हैं। केवल कुलाचार में तत्पर, गुरुभक्त, दृढ़ब्रती जो पूर्णाभिषेक से पवित्र है, वे इसी जन्म में मुक्त होते हैं।
हे कुलनायिके! जो दिवङ्गत हैं, वे पूर्णाभिषेक से पवित्र होकर उत्तम जन्म को प्राप्त करते हैं, यह शङ्कर का वचन है। यदि पूर्णाभिषेक से हीन जो कौलिक मरता है, वह प्रलय होने तक पिशाचयोनि में रहता है।
दीक्षा दो प्रकार की कही गई है - १. बाह्य, २. आभ्यन्तर। क्रियादीक्षा बाह्य है और वेध आभ्यन्तरी कही गई है।
अन्तः शुद्धि और बहिः शुद्धि - ये दो कही गई हैं। क्रियाशुद्धि अन्तरा है और दीक्षा से बहिःशुद्धि होती है।
मोक्षदीप के समान दीक्षा द्वारा चाण्डाल भी मुक्त होता है। हे कुलेशानि! उक्त दोनों के बिना कौलिक की मुक्ति नहीं होती।
न तो शरीर का संस्कार होता है, न कर्मों का। अनादि शक्ति कुल कुण्डली है रूप दीक्षा के द्वारा अन्तःकरण का संस्कार किया जाता है।
ये दीक्षाएँ कर्म की समता में उत्तम आचार्य और शिष्य के अनुसन्धान से हे देवि! भित्र फल की प्रतिपादका होती है।
हे कुलेश्वरि! जैसे मन्त्र और औषधि द्वारा विष की शक्ति नष्ट की जाती है, वैसे ही दीक्षा द्वारा मन्त्रज्ञ पशुपाश को क्षण भर में काट देता है।
इस बन्धन से छूटने से परम संस्थान का ज्ञान होता है दीक्षा ही मोक्ष देती है और दिव्य धाम तक पहुँचाती है।
हे देवेशि! विधिपूर्वक दी गई दीक्षा से लाखों छोटे पाप और कोटि बड़े पाप क्षण भर में भस्म हो जाते हैं।
जिसके द्वारा पशुओं की आत्मा स्वतन्त्र होती है, हे देवि! वह 'दीक्षा' पशुपाश से छुड़ाने वाली है।
हे प्रिये! जिससे दीक्षित होने मात्र से विश्वास उत्पन्न होता है, वही 'दीक्षा' मोक्षदायिनी है। शेष तो जनसेविका हैं।
जिसके बिना सैकड़ों उपासनाओं द्वारा भी सिद्धि नहीं मिलती, उस 'दीक्षा' का आश्रय मन्त्रसिद्धि के लिये गुरुदेव से प्राप्त करे।
रसेन्द्र (पारद) से बिद्ध लौह जैसे सुवर्ण बन जाता है, हे प्रिये! वैसे ही दीक्षा से बिद्ध आत्मा शिवत्व को प्राप्त करती है।
दीक्षा की अग्नि से जिसके कर्म दग्ध हो जाते हैं, वह माया के बन्धनों से मुक्त होकर ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त कर निबींज हो शिव हो जाता है। दीक्षासंस्कार से सम्पन्न होने पर शूद्र की शूद्रता और विप्र की विप्रता नहीं रहती और इस प्रकार जातिभेद नहीं रहता।
शिवलिङ्ग को शिला समझने से जो पाप होता है, वही पाप दीक्षित को पूर्वावस्था का स्मरण करने से लगता है।
जिस प्रकार लिङ्गरूप में प्रतिष्ठित होने पर काष्ठ, पत्थर, लौह, मिट्टी, रत्न की जाति नहीं रह जाती, उसी प्रकार सभी वर्ण के मनुष्य दीक्षित होकर शुद्ध ही कहे जाते हैं।
ब्रह्म से लेकर भुवन तक सभी दीक्षित द्वारा पूजा पाकर सब प्रकार से प्रसन्न होते हैं इसमें संशय नहीं है।
दीक्षित व्यक्ति को तप, नियम, व्रत, तीर्थयात्रा करने और शरीर को कष्ट देने की आवश्यकता नहीं होती।
हे प्रिये! दीक्षाहीन व्यक्ति जप पूजादि जो क्रियाएँ करते हैं, पत्थर में बोये हुये बीज के समान वे जपादि क्रियाएँ फल नहीं देतीं।
दीक्षाविहीन को न सिद्धि मिलती है, न सद्गति। हे देवि! अतः सब प्रयत्न करके गुरु से दीक्षित होना चाहिये।
जो द्विज अन्त्यज के बाद दीक्षित होता है, वह द्विज अन्त्यज से कनिष्ठ होता है और अन्त्यज ज्येष्ठ होता है, शास्त्र का यही निर्णय है।
गुरुशक्ति और गुरुपुत्रों में, जो पहले दीक्षा पाये हुये हैं, वे गुरु के समान पूजनीय हैं। उनकी कभी अवमानना न करे।
यदि शिष्य केवल दीक्षित हुआ हो और गुरु का स्वर्गवास हो जाय, तो उनकी सन्तान द्वारा संस्कार पूर्ण कराये।
हे प्रिये! सभी दर्शनों में ज्ञान रखने वाले गुरु द्वारा जो विधिपूर्वक दीक्षा लेता है, वही मुक्त होता है, अन्य नहीं।
पहले अधिवासन कर चक्रपूजा के साथ दीक्षा द्वारा शिष्य का शोधन करे। अन्यथा फल नहीं होता।
शूद्र और वर्णसङ्कर व्यक्तियों की पूर्वशुद्धि आवश्यक है। पादोदक आदि देकर उन्हें पापों से छुड़ाना चाहिए।
द्विज एक वर्ष में, क्षत्रिय दो वर्षों में, वैश्य तीन वर्षों में और शूद्र चार वर्षों में दीक्षा के योग्य होता है।
विधवा की दीक्षा पुत्र की अनुमति से, कन्या की पिता की अनुमति से और विवाहिता की पति की अनुमति से दीक्षा करे। स्त्रियों को स्वतः दीक्षा लेने का अधिकार नहीं है।
हे प्रिये! जैसे वेद के अध्ययन में शूद्र अधिकारी नहीं है, हे कुलेश्वरि! वैसे ही अदीक्षित साधना का अधिकारी नहीं होता।
दीक्षा पाकर शिष्य श्री गुरुदेव, गुरुपत्नी, गुरुपुत्र, शक्तियों और कौलिकों को हे देवि! यथाशक्ति सन्तुष्ट करे।
इस प्रकार गुरुशिष्य की परीक्षा और दीक्षा भेदादि के सम्बन्ध में मैंने आपसे कुछ बताया। अब हे देवि! आप क्या सुनना चाहती हैं?
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