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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 56
मीनस्तु लम्बिका देवि वक्त्रं कलस उच्यते । पञ्चगवयामृतापूर्ण शिष्यं तेनाभिषेचयेत् ॥ अयं सिद्धाभिषेकः स्यादाचार्यस्यापि पार्वति । त्रिकालं दन्तकाष्ठश्च पुष्पाञ्जलिरपि प्रिये ॥
हे देवि! 'मीन' लम्बिका (जिह्वा) है और 'कलश' मुख को कहा है। इस प्रकार पञ्चगव्यामृत से पूर्ण मुख द्वारा शिष्य का अभिषेक करे। हे पार्वति! यह सिद्धाभिषेक है और आचार्य के लिये भी वाञ्छनीय है।
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