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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 58
पूर्णाभिषेकपूता ये मृताश्च कुलनायिके । पुनर्लब्ध्वोत्तमं जन्म गुरुणा शिवरूपिणा ॥ शुद्धाः पूर्णाभिषेकेण शिवसायुज्यदायिना । तेन मुक्तिं व्रजेयुस्ते शाम्भवी वाचमब्रवीत् ॥ पूर्णा (दीक्षा) भिषेकहीनो यः कौलिको प्रियते यदि । पिशाचत्वमवाप्नोति यावदाहृतसंप्लवम् ॥
हे कुलनायिके! जो दिवङ्गत हैं, वे पूर्णाभिषेक से पवित्र होकर उत्तम जन्म को प्राप्त करते हैं, यह शङ्कर का वचन है। यदि पूर्णाभिषेक से हीन जो कौलिक मरता है, वह प्रलय होने तक पिशाचयोनि में रहता है।
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