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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 44
चित्तं तत्त्वे समाधाय परतत्त्वोपबृंहितान् । उच्चरेत् संहतान्मन्त्रान् वाग्दीक्षेति निगद्यते ॥
अपने चित्त को तत्त्व में स्थित कर परतत्त्व से उत्प्रेरित होकर गुरु संहत रूप से मन्त्रोपदेश करे। यह 'वागदीक्षा' है।
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