दीक्षासमयसम्प्राप्ता ज्ञानविज्ञानवर्जिताः ।
भक्त्या प्रध्वस्तपर्याया मध्ययोग्याश्च ते स्मृताः ॥
मध्य योग्य वे हैं, जो दीक्षा के समय में आकर ज्ञान अथवा अज्ञान से रहित होकर जो भक्ति द्वारा संशयहीन होते हैं, वे शिष्य 'मध्यमयोग्य' कहे गए हैं।
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