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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 57
शद्धे वेदकलान्यासस्तज्ज्ञानञ्चाष्टधा भवेत् । समयो दन्तकाष्ठेन साधकः कुसुमाञ्जलिः ॥ पुत्रं शङ्खाभिषेकेण बोधको वेधसंज्ञया । पूर्णाभिषेकेणाचार्यः पञ्चावस्थाः प्रकीर्त्तिताः ॥ कुलाचारैकनिरता गुरुभक्ता दृढव्रताः । पूर्णाभिषेकपूता ये ते मुक्ताश्चेह जन्मनि ॥
१-३. तीनों समय दन्तधावन, ४-६. तीनों समय पुष्पाञ्जलि, ७. शङ्खोदक से अभिषेक और ८. वेधन - इस प्रकार आठ क्रियायें हैं। फिर १. शङ्खाभिषेक, २. बोधन, ३. वेध, ४. पूर्णाभिषेक और ५. आचार्य - ये पाँच अवस्थायें कही गई हैं। केवल कुलाचार में तत्पर, गुरुभक्त, दृढ़ब्रती जो पूर्णाभिषेक से पवित्र है, वे इसी जन्म में मुक्त होते हैं।
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