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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 4
तस्मात् सिद्धान्तं सम्प्राप्य सम्प्रदायादिहेतुभिः । अन्तरेणोपदेष्टारं मन्त्राः स्युर्निष्फला यतः ॥ देवास्तमेव शंसन्ति पारम्पर्यप्रवर्त्तकम् । गुरुं मन्त्रागमाभिज्ञं समयाचारपालकम् ॥
अतः सम्प्रदाय आदि साधनों से सिद्धान्त को जान कर आन्तरिक उपदेश देने वाले को प्राप्त करे, अन्यथा मन्त्र निष्फल होते हैं। परम्परा के प्रवर्तक, मन्त्र और आगम के ज्ञाता और समयाचार के पालन करने वाले गुरु को ही देवता मानते हैं।
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