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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 47
मनोदीक्षा द्विधा प्रोक्ता तीव्रा तीव्रतरापि च । अध्वानं ष‌ड्विधं ज्ञात्वा शिष्यदेहे स्मरन् प्रिये ॥ कल्पयेद्भुवनं तत्त्वं कलां वर्णं पदं मनुम् । आजानुनाभिहत्कण्ठतालुमूर्द्धान्तमम्बिके गुरूपदिष्टमार्गेण वेधं कुर्याद्विचक्षणः । पाशयुक्तः क्षणाच्छिष्यश्छिन्नपाशस्तदा भवेत् ॥
'मनोदीक्षा' १. तीव्रा और २. तीव्रतरा दो प्रकार की है। हे प्रिये! शिष्य के शरीर में १. भुवन, २. तत्त्व, ३. कला, ४. वर्ण, ५. पद, ६. मन्त्र - इन छः अध्वानों का स्मरण करते हुए क्रमशः १. जानु, २. नाभि, ३. हृदय, ४. कण्ठ, ५. तालु और ६. मूर्द्धा में हे अम्बिके! गुरुपदिष्ट मार्ग से वेध करे।
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