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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 27
यथा कपिश्च शाखायां शाखामुल्लंघ्य यत्नतः । फलं प्राप्नोति धर्मस्य चोपदेशस्तथा प्रिये ॥
हे प्रिये! जैसे बन्दर यत्नपूर्वक एक डाली से दूसरी डाली को पारकर फल को प्राप्त करता है, वैसा ही क्रम धर्म के उपदेश का है।
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