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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 32
यथा कूर्मः स्वतनयान् ध्यानमात्रेण पोषयेत् । वेधदीक्षोपदेशश्च मानसः स्यात् तथाविधः ॥
जैसे कछुई (कच्छपी) अपने बच्चों का पालन केवल ध्यान द्वारा करती है, उसी प्रकार मानस 'वेधदीक्षा' का उपदेश होता है।
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