शिष्य भी निम्न गुणों से युक्त गुरु कीं परीक्षा करके ही शिष्य बने। जप, स्तोत्र, ध्यान, होम एवं पूजन आदि के करने में जिसे आनन्द मिलता हो, ज्ञानोपदेश करने को सामर्थ्य जिसमें हो और हे ईश्वरि! जिसमें मन्त्रसिद्धि और वेधकत्व का परिज्ञान हो - इन लक्षणों से गुरु को पहचान कर शिष्य बने, अन्यथा नहीं।
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