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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 20
शिष्योऽपि लक्षणैरेतैः कुर्याद् गुरुपरीक्षणम् । आनन्दाद्यैर्जपस्तोत्रध्यानहोमार्चनादिषु ज्ञानोपदेशसामर्थ्य मन्त्रसिद्धिमपीश्वरि । वेधकत्वं परिज्ञाय शिष्यो भूयान्न चान्यथा ॥
शिष्य भी निम्न गुणों से युक्त गुरु कीं परीक्षा करके ही शिष्य बने। जप, स्तोत्र, ध्यान, होम एवं पूजन आदि के करने में जिसे आनन्द मिलता हो, ज्ञानोपदेश करने को सामर्थ्य जिसमें हो और हे ईश्वरि! जिसमें मन्त्रसिद्धि और वेधकत्व का परिज्ञान हो - इन लक्षणों से गुरु को पहचान कर शिष्य बने, अन्यथा नहीं।
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