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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 49
देवि तीव्रतरा चापि गुरुणा स्मृतमात्रतः । सम्यक् संवेधिनः शिष्यश्छिन्नपापस्तदा भवेत् ॥ वाह्यव्यापारनिर्मुक्तो भूमौ पतति तत्क्षणात् । सञ्जातदिव्यभावोऽसौ सर्वं जानाति शाम्भवि ॥ यदस्ति वेधकाले तत् स्वयमेवानुभूयते । प्रबुद्धः सन् न शक्नोति तत् सुखं वक्तुमीश्वरि ॥
'तीव्रतरा दीक्षा' में गुरु के द्वारा स्मृतिमात्र से सम्यक् रूप से संवेधित होकर शिष्य उसी समय पापमुक्त हो जाता है और बाह्य क्रियाओं से शून्य होकर पृथ्वी पर तुरन्त गिर पड़ता है। हे शाम्भवि! दिव्यभाव को प्राप्त कर वह सर्वज्ञ हो जाता है। वेधकाल में जो होता है, उसे वह स्वयं ही अनुभव करता है। हे ईश्वरि! प्रबुद्ध होने पर उस सुख का वर्णन करने में वह समर्थ नहीं हो पाता।
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