शरीरस्य न संस्कारो जायते न च कर्मणः ।
आत्मनः कारयेद्दीक्षामनादिकुलकुण्डलीम् ॥
न तो शरीर का संस्कार होता है, न कर्मों का। अनादि शक्ति कुल कुण्डली है रूप दीक्षा के द्वारा अन्तःकरण का संस्कार किया जाता है।
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