मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 39
कलादीक्षा त्रिधा ज्ञेया कर्त्तव्या विधिवत् प्रिये । निवृत्तिर्जानुपर्यन्तं तलादारभ्य संस्थिता ॥ जानुनोर्नाधिपर्यन्तं प्रतिष्ठा तिष्ठति प्रिये । नाभेः कण्ठावधि व्याप्ता विद्या शान्तिस्ततः परम् ॥ कण्ठाल्ललाटपर्यन्तं व्याप्ता तस्माच्छिरोऽवधि । शान्त्यतीता कला चैषा कलाव्याप्तिरितीरिता ॥
हे प्रिये! 'कलादीक्षा' तीन प्रकार की है, जिसे विधिवत् करे। १. पैरों के तलवे से लेकर घुटनों तक 'निवृत्ति', २. घुटनों से नाभि तक 'प्रतिष्ठा', ३. नाभि के कण्ठ तक 'विद्या', ४. कण्ठ से ललाट तक 'शान्ति', ५. ललाट से शिर तक 'शान्त्यतीता' - ये पाँच कलाएँ स्थित हैं। यही कलाएँ 'कलाव्याप्ति' नाम से जानी जाती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें