मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 40
संहारक्रमयोगेन स्थानात् स्थानान्तरं प्रिये । संयोज्य विधिवत् सम्यग्विधिवेत्ता शिरोऽवधि ॥ इयं प्रोक्ता कुलेशानि दिव्यभावप्रदायिनी । अष्टत्रिंशत्कलाभिर्वा पञ्चाशद्धिरथापि वा ॥
हे प्रिये! संहार क्रम के योग से एक स्थान से दूसरे स्थान में उक्त कलाओं के अनुक्रम के अनुसार शिरपर्यन्त विधिवत् संयोजन किया जाता है। हे कुलेशानि! इससे शिष्य को दिव्यभाव प्राप्त होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें