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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 19
तत्कर्मसूचकैर्वाक्यैर्मायाभिः क्रूरचेष्टितैः । पक्षपातैरुदासीनैरनेकैश्च मुहुर्मुहुः ॥ आकृष्टस्ताडितो वापि यो विषादं न याति च । गुरुः कृपां करोतीति मुदा सञ्चिन्तयेत् सदा ॥ श्रीगुरोः स्मरणे चापि कीर्त्तनं दर्शनेऽपि च । वन्दने परिचर्यायामाह्वाने प्रेषणे प्रिये ॥ आनन्दकम्परोमाञ्चस्वरनेत्रादिविक्रियाः येषां स्युस्तेऽत्र योग्याश्च दीक्षासंस्कारकर्मणि ॥
उन कर्मों के सूचक वाक्यों, मायाओं, क्रूर चेष्टाओं द्वारा पक्षपात और उदासीनता से बारम्बार शिष्य को आकृष्ट करे और ताड़ित होकर भी जो शिष्य दुःखी न हों, अपितु सदा प्रसन्न होकर यही सोचें कि 'गुरु कृपा कर रहे हैं' और श्रीगुरु का स्मरण, कीर्तन, दर्शन, वन्दन, परिचर्या एवं आज्ञा पालनादि करने में जिन्हें रोमाञ्च, कम्प, गद्गद् स्वर, डबडबाते नेत्रादि के साथ आनन्द का अनुभव हो, वे शिष्य इस दीक्षासंस्कार कर्म के योग्य हैं।
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