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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 52
वेधदीक्षाकरो लोके श्रीगुरुर्दुर्लभः प्रिये । शिष्योऽपि दुर्लभस्तादृक् पुण्ययोगेन लभ्यते । न दद्याद् यस्य कस्यापि इत्याज्ञा परमेश्वरि ॥
हे प्रिये! वेधदीक्षा करने वाला गुरु संसार में दुर्लभ है, वैसा शिष्य भी दुर्लभ है, पुण्ययोग से ही मिलता है। अतः हे परमेश्वरि! यह दीक्षा जिस किसी को न दे, ऐसी आज्ञा है।
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