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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 38
जायते देवताभावः परानन्दमयः शिशोः । एषा वर्णमयी प्रोक्ता दीक्षा पाशहरा प्रिये ॥
इस प्रकार शिष्य में देवभाव उत्पन्न होकर वह परानन्दमय होता है। हे प्रिये! यह वर्णमयी दीक्षा पाशों को काटने वाली (पापहारिणी) कही गई हैं।
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