दोनों आँखें बन्द कर परत्तत्त्व का ध्यान करते हुये प्रसन्नबुद्धि से गुरुदेव शिष्य को अच्छी तरह देखें। हे प्रिये! यह 'दृग्दीक्षा' होती है।
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