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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 45
निमील्य नयने ध्यात्वा परतत्त्वप्रसन्नधीः । सम्यक् पश्येद्‌गुरुः शिष्यं दृग्दीक्षा च भवेत् प्रिये ॥
दोनों आँखें बन्द कर परत्तत्त्व का ध्यान करते हुये प्रसन्नबुद्धि से गुरुदेव शिष्य को अच्छी तरह देखें। हे प्रिये! यह 'दृग्दीक्षा' होती है।
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