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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 51
आनन्दश्चैव कम्पश्चेद्भवो घूर्णा कुलेश्वरि । निद्रा मूर्च्छा च वेधस्य षडवस्थाः प्रकीर्त्तिताः ॥ दृश्यन्ते षड्‌गुणा होते वेधकाले कुलेश्वरि । वेधितो यत्र कुत्रापि तिष्ठेन्मुक्ता न संशयः ॥
हे कुलेश्वरि! वेध की छः अवस्थायें कही गई हैं - १. आनन्द, २. कम्प, ३. उद्भव, ४. घूर्णा, ५. निद्रा और ६. मूर्च्छा। वेध दीक्षा होने पर शिष्य में ये ६ गुण दिखाई पड़ते हैं। हे कुलेश्वरि! बेधित जहाँ कहीं भी रहे, मुक्त रहता है, इसमें सन्देह नहीं।
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