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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 63
दीक्षा होताः कर्मसाम्ये भिन्नार्थप्रतिपादिकाः । अभिसन्धानतो देवि देशिकोत्तमशिष्ययोः ॥
ये दीक्षाएँ कर्म की समता में उत्तम आचार्य और शिष्य के अनुसन्धान से हे देवि! भित्र फल की प्रतिपादका होती है।
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