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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 41
तत्त्वन्यासक्रमेणैव सृष्टिसंहारमार्गतः । ज्ञात्वा गुरुमुखाद्देविं शिष्ये संयोज्य वेधयेत् ॥
अथवा हे देवि! ३८ या ५० कलाओं से तत्त्वन्यास के क्रम से सृष्टि संहार मार्ग से गुरुमुख से जानकर शिष्य में संयोजन कर वेधन करे।
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