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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 35
क्रियादीक्षाष्टया प्रोक्ता कुण्डमण्डपपूर्विका । कलसादिसमायुक्ता कर्त्तव्या गुरुणा बहिः । देवेशि देहशुद्ध्यर्थं पूर्वोक्तविधिनाचरेत् ॥ वर्णदीक्षा त्रिधा प्रोक्ता द्विचत्वारिंशदक्षरैः । पञ्चाशद्वर्णैर्वा देवि द्विषष्टिलिपिभिस्तु ता ॥
कुण्ड, मण्डप और कलश आदि से युक्त 'क्रियादीक्षा' आठ प्रकार की है, जिसे बाहापूजा विधि से गुरु को करना चाहिये। हे देवेशि! पूर्वोक्त विधि का देह शुद्धि के लिए आचरण करना चाहिए। 'वर्णदीक्षा' ४२, ५० या ६२ अक्षरों के (न्यास के) भेद से तीन प्रकार की है।
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