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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 24
आदौ भक्तिविहीना ये मध्यभक्तास्तु ये नराः । अन्तप्रवृद्धभक्ताश्च अन्तयोग्या भवन्ति ते ।
अन्त योग्य (श्रेष्ठ) जो नर आदि में भक्तिहीन रहकर मध्य में भक्तिमान हो अन्त में अति भक्त होते हैं वे 'अन्तयोग्य' शिष्य होते हैं।
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