आदौ भक्तिविहीना ये मध्यभक्तास्तु ये नराः । अन्तप्रवृद्धभक्ताश्च अन्तयोग्या भवन्ति ते ।
अन्त योग्य (श्रेष्ठ) जो नर आदि में भक्तिहीन रहकर मध्य में भक्तिमान हो अन्त में अति भक्त होते हैं वे 'अन्तयोग्य' शिष्य होते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।