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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 50
वेधविद्धः शिवः साक्षान्न पुनर्जन्मभाग् भवेत् । एषा तीव्रतरा दीक्षा भवबन्धविमोचनी । शिवभावप्रदा साक्षात् त्वां शपे कुलनायिके ॥
इस प्रकार वेधविद्ध शिष्य साक्षात् शिव होता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यह संसार के बन्धन से छुड़ाने वाली 'तीव्रतरा दीक्षा' है। यह साक्षात शिवभाव प्रदान करती है। हे कुलनायिके! इस प्रकार से मैं आपसे दृढ़तापूर्वक कहता हूँ।
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