अत्यन्त भक्त, सत्शिष्य को जो ज्ञानोपदेश किया जाता है, वह ज्ञान अखण्ड शास्त्रार्थ का विधायक होता है किन्तु भक्तिहीन, असत् शिष्य को जो ज्ञान दिया जाता है, वह कुत्ते द्वारा स्पृष्ट गोदुग्ध के समान अपवित्र होता है।
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