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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 29
स्पर्शाख्या देवि दृक्संज्ञा मानसाख्या महेश्वरि । क्रियायासादिरहिता देवा दीक्षा त्रिधा स्मृता ॥
हे महेश्वरि! हे देवि! कर्म से रहित दीक्षा तीन प्रकार की है - १. स्पर्श, २. दृक् और ३. मानस।
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