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कुलार्णव • अध्याय 14 • श्लोक 71
दीक्षाग्निदग्धकर्मासौ मायाविच्छिन्नबन्धनः । गतः परां ज्ञानकाष्ठां निर्बीजस्तु शिवो भवेत् ॥ गतं शूद्रस्य शूद्रत्वं विप्रस्यापि च विप्रता । दीक्षासंस्कारसम्पन्ने जातिभेदो न विद्यते ॥
दीक्षा की अग्नि से जिसके कर्म दग्ध हो जाते हैं, वह माया के बन्धनों से मुक्त होकर ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त कर निबींज हो शिव हो जाता है। दीक्षासंस्कार से सम्पन्न होने पर शूद्र की शूद्रता और विप्र की विप्रता नहीं रहती और इस प्रकार जातिभेद नहीं रहता।
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