दीक्षा की अग्नि से जिसके कर्म दग्ध हो जाते हैं, वह माया के बन्धनों से मुक्त होकर ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त कर निबींज हो शिव हो जाता है। दीक्षासंस्कार से सम्पन्न होने पर शूद्र की शूद्रता और विप्र की विप्रता नहीं रहती और इस प्रकार जातिभेद नहीं रहता।
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