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अध्याय 2 — स्पष्टाधिकार:

सूर्य सिद्धांत
69 श्लोक • केवल अनुवाद
भगण (क्रान्तिवृत्त) पर अश्रित शीघ्रोच्च, मन्दोच्च एवं पात संज़्क काल की अदृश्य मूर्तियाँ ग्रहों की गति का कारण होती हैं। अर्थात्‌ इन्हीं अदृश्य मूर्तियों के कारण ग्रहपिण्डों में गति उत्पन्न होती है।
इन शीपघ्रोच्च मन्दोच्च पात संज्ञक अदृश्य शक्तियों की वायुरूपी रस्सी से बँधे हुये ग्रह उन्हीं शक्तियों द्वारा वामदक्षिणहस्त से अपनी दिशा में अपने समीप अपकृष्ट होते (खींच लिए जाते) हैं।
प्रबह नामक वायु (सूर्यादि) ग्रहों को उनके उच्चों की तरफ प्रेरित करती है (ढकेल देती हैं)। पूर्व और पश्चिम की ओर खिनचें हुये ग्रहों की भिन्न-भिन्न गति होती जाती है।
ग्रहों का उच्च संज्ञक स्थान यदि पूर्व दिशा में ६ राशि (१८०९) से अल्प दूरी पर हो तो ग्रह को पूर्व दिशा में तथा यंदि पश्चिम में हो तो पश्चिम दिशा में खींच लेता है।
अपने अपने उच्च स्थानों से अपंकृष्ट ग्रह अपने मध्यम स्थान से जितने राश्यादि तक पूर्व दिशा में जाते हैं उतने राश्यादि मान (उच्चाकर्षण फल) मध्यम ग्रह में जोड़े जाते हैं। अत: इसे धन संस्कार कहते हैं तथा पश्चिम दिशा में उच्चाकर्षण फल घटाया जाता है अतएव उसे ऋण संस्कार कहते हैं।
इसी प्रकार (पूर्वोक्त कारणों की तरह) राहु नामक पात (स्वविमण्डल एवं क्रान्ति मण्डल का सम्पात) भी क्रान्त्यन्त बिन्दु से ग्रह को अत्यन्त वेग से उत्तर और दक्षिण दिशा में विक्षेप तुल्य दूरी तक विक्षिप्त करता है।
यदि पातस्थान ग्रह से पश्चिम दिशा में ६ राशि से अल्प दूरी पर होता है तो ग्रह को उत्तर दिशा में और यदि ६ राशि से अल्प पूर्व दिशा में होता है तो ग्रह को दक्षिण दिशा में आकर्षित कर लेता है।
बुध और शुक्र के शीघ्रोच्चों से इनके पात (बुध और शुक्र के विमण्डल और क्रान्तिमण्डल के सम्पात) पूर्वोक्त नियमानुसार पूर्व दिशा में यदि ६ राशि से अल्प दूरी पर हों तथा पश्चिम दिशा में भी ६ राशि से अल्प हों तो क्रम से उत्तर एवं दक्षिण में आकर्षित करता है।
सूर्य का विम्बमान बृहद होने से सूर्य अपने मन्दोच्च पात द्वारा अल्प आकर्षित होता है किन्तु विम्बमान लघु होने से चन्द्रमा अपने मन्दोच्च से सूर्य की अपेक्षा अत्यधिक आकर्षित हो जाता है।
भौमादि पज्चताराग्रह लघु विम्बात्मक होने के कारण अपने-अपने शीतपघ्रोच्च और मन्दोच्च रूपी अदृश्य दैवी शक्तियों द्वारा अत्यन्त वेग पूर्वक सूटूर (अधिक टूरी तक) अपकृष्ट हो जाते हैं।
यही कारण है कि भौमादि ग्रहों में उनकी गतियों के कारण धन एवं ऋण संस्कार अधिक होते हैं। इस प्रकार प्रबह वायु के वेग से आहत होकर अपने अपने पातों से आकृष्ट होते हुये भौमादि ग्रह आकाश में अपनी-अपनी वक्षा में भ्रमण करते हैं।
वक्र (अनुलोम), अनुवक्र, कुटिल, मन्द, मन्दतर, सम, शीघ्रतर तथा शीजदघ्र, ये आठ प्रकार की ग्रहों की गतियाँ होती हैं।
इन आठ प्रकार की गतियों में अतिशीघ्र, शीघ्र, मन्द, मन्दतर और सम ये पाँच प्रकार की मार्गी (ऋजुमार्गी) गतियाँ है। जो वक्रगति है, वहीं अनुवक्र भी हैं अर्थात्‌ वक्र अनुवक्र एवं कुटिल (विकल) ये तीनों गतियाँ वक्र (अनुलोम) गति संज्ञक होती हैं। इस प्रकार गतियों के मार्गी और वक्री प्रमुख दो भेद होते हैं।
उन (पूर्वोक्त) गतियों के अनुसार प्रतिदिन ग्रह जिस प्रकार दृकतुल्य हो जाते हैं (अर्थात्‌ जिस स्थान पर वेध द्वारा दृग्गोचर होते हैं) उस स्पष्टीकरण प्रक्रिया को मैं आदरपूर्वक कह रहा हूँ।
एक राशि में जितनी कलाएं होती है उनके अष्टमांश को प्रथम ज्यार्ध कहते हैं। (अर्थात्‌ १ राशि x ३० = ३० x ६० = १८०० कला। १८०० का १/८ = २२५ कला = १ ज्यार्ध) प्रथम ज्यार्ध को प्रथम ज्यार्ध से ही भाग देकर लब्धिं को प्रथम ज्यार्ध में घटाकर शेष को प्रथम ज्यार्ध में जोड़ने से द्वितीय ज्यार्ध का मान होता है।
आद्य (प्रथम) ज्यार्ध से अग्रिम पिण्डों को विभकत कर लब्धि से रहित ज्याखण्डों को ज्यार्ध में जोड़ने से अग्रिम ज्यापिण्ड होता है। इसी प्रकार क्रम सें २४ ज्यार्ध पिण्डों के मान होते हैं। यथा---राशि लिप्ता = १८०० कला। १८०० x १/८ = २२५ = प्रथम ज्यार्द्ध पिण्ड।
एक वृत्तपाद में साधित २४ ज्या पिण्डों के मान क्रम से इस प्रकार हैं:- (१) तत्वाश्विन: = २२५ (२) आड्डब्धिकृत: = ४४९ (३) रूपभूमिधरत्तव: = ६७१ (४) खाड्डाष्टौ = 55८९० (५) पज्चशून्येशा: = ११०५ (६) बाणरूपगुणेन्दव: - १३१५
(७ ) शून्यलोचनपञ्चैक: = १५२० (८) छिद्ररूपमुनीन्दव: = १७१५९ (९) वियच्चान्द्रातिधृतय: = १९१० (१०) गुणरश्राम्बराश्विन: = २०९३
(११) मुनिषड्यमनेत्राणि = २२६७ (१२) चन्द्राग्नकिदस्रका: = २४३१ (१३) पज्चाष्टविषयाक्षीणि = २५८५ (१४) कुज्जराश्विनगाश्विने: - २७२८
(१५) रन्ध्रपज्चाष्टकयमा: = २८५९ (१६) वस्वद्रयड्डूयमा = २९७८ (१७) कृताष्टशून्यज्वकन = ३०८४ (१८) नगाद्रिशशिवहनय: = ३१७७
(१९) षट्पञज्चलोचनगुणा: = ३२५६ (२०) चन्द्रनेत्राग्विविहनय: = ३३२१ (२१) यमाद्रिवहिनज्वलना: = ३३७२ (२२) रन्श्रशून्यार्णवाग्गय: = ३४०९ (२३) रूपाग्निसागरगुणा: = ३४३१ (२४) वस्वग्निकृतवहनय: = ३४३८
उत्क्रम (अर्थात्‌ विपरीत क्रम से) ज्यार्ध पिण्डों को व्यासार्ध (त्रिज्या) से घटाने पर २४ उत्क्रमज्याओं के मान ज्ञात हो जाते हैं।
(१) मुनय: = ७ (२) रन्प्रयमला = २९ (३) रसषट्का: = ६६ (४) मुनीश्वरा: = ११७ (५) द्व्यष्टेका = १८२ (६) रूपषड्टस्त्र = २६१ (७ ) सागरार्थहुताशना = ३५४
(८) खर्तुवेदा: = ४६० (९) नवाद्रबर्था: = ५७९ (१०) दिड्दनगा: = ७१० (११) त्र्यर्थकुज्जर: = ८५३ (१२) नगाम्बरवियच्चन्द्रा: = १००७ (१३) रूपभूधरशंकरा: = ११७१
(१४) शरार्णवहुताशैका: = १३४५ (१५) भुजड़ाक्षिशरेन्द्व: = १५२८ (१६) नवरूपमहीघ्रैका = १७१९ (१७) गजेकाड्ूनिशाकरा = १९१८
(१८) गुणाश्विरूपनेत्राणि = २१२३ (१९) पावकाग्निगुणाश्विन: = २३३३ (२०) वस्वर्णवार्थयमलछा = २५०७८ (२१) तुरड्डर्तुनगाश्विम: = २७६७
(२२) नवाष्टनवनेत्राणि = २९८९ (२३) पावकैकयमाग्नय: = ३२१३ (२४) गजाग्निसागरगुणा: = ३४३८
परमक्रान्तिज्या का मान १३९७ कला होता है। परमक्रान्तिज्या से इष्टज्या को गुणाकर गुणनफल में त्रिज्या (३४३८) से भाग देने से लब्धि इष्ट क्रान्तिज्या होती है इसका चाप मान इष्टक्रान्ति होता है।
(अहर्गणोत्पन्न) मध्यमग्रह को अपने अपने मन्दोच्च एवं शीघ्रोच्च से घटाने पर शेष क्रमश: मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र होते हैं। ( अर्थात्‌ मन्दोच्च - मध्यम ग्रह = मन्द केन्द्र, शीघ्रोच्च - मध्यमग्रह = शीभघ्रकेन्द्र) केन्द्र से पद ज्ञान तथा पद से भुज और कोटि का ज्ञान किया जाता है।
विषम पद में गत चाप की जीवा भुजज्या तथा गम्य चाप की जीवा कोटि संज़्क होती है। सम पद में (विपरीत ) गम्य चाप की जीवा भुजज्या तथा गत चाप की ज्या कोटिज्या होती है।
जिस चाप की ज्या अभीष्ट हो, उस चाप की कला को २२५ से भाग देने पर लब्धि गत ज्यापिण्ड होता है। शेष को ऐष्य (अग्रिम) ज्या पिण्ड और गत ज्या पिण्ड के अन्तर से गुणा कर
गुणन फल को २२५ से भाग देने पर जो लब्धि प्राप्त हो उसे गत ज्यापिण्ड में जोड़ने से अभीष्ट चाप की ज्या होगी। यही ज्या, साधन की विधि हैं तथा इसी प्रकार उत्क्रमज्या का भी साधन किया जाता है।
इष्टज्या से जितनी ज्या घट सके उन्हें घटाकर शेष को २२५ से गुणा कर उसमें दोनों (गत और गम्य) ज्या के अन्तर से भाग देने पर प्राप्त लब्धि को, शुद्ध ज्या संख्या और २२५ के गुणनफल में जोड़ देने पर अभीष्ट चाप का मान ज्ञात हो जायेगा।
सम पदान्त में सूर्य का १४ एवं चन्द्रमा का ३२ अंश मन्द परिध्यंश होता है। विषम पद में समपद की अपेक्षा २० कला न्यून अर्थात्‌ सूर्य का मन्द परिध्यंश १३ अंश ४० कला तथा चन्द्रमा का ३१ अंश ४० कला होता है।
भौमादि पाँच ग्रहों के क्रम से समपदान्त में ७५, ३०, ३३, १२, ४९ अंश मन्द परिध्यंश होते हैं तथा विषम पदान्त में क्रम से ७२, २८, ३२, ११ एवं ४८ मन्द परिध्यंश होते है।
समपदान्त में भौमादि ग्रहों के शीघ्र परिध्यंश क्रम से २३५, १३३, ७०, २६२, ३९ अंश होते हैं तथा विषम पदान्त में क्रमश: २३२, १३२, ७२, २६०, ४० अंश शीघ्रफल साधन हेतु शीघ्र परिध्यंश कहे गये हैं।
अर्थात्‌ समपद (२, ४) में भौम का शीघ्र परिध्यंश २३५, बुध का १३३, गुरू का ७०, शुक्र का २६२ तथा शनि का ३९ तथा विषम पद (१, ३) में भौम का २३२, बुध का १३२, गुरू का ७२, शुक्र का २६० तथा शनि का ४० अंश कहा गया है।
विषम और समपदान्त की मन्द अथवा शीघ्र परिधियों के अन्तर को मन्दकेन्द्र या शीकघ्रकेन्द्र की भुजज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर प्राप्त लब्धि को समंपदान्त परिधि में धन ऋण करने से स्फूट परिधि होती है। यदि केन्द्र समपदान्त में हों और विषमपदान्त की परिधि से समपदान्त की परिधि अल्प हो तो लब्ध फल का समपदान्त परिधि में धन संस्कार अधिक होने पर ऋण संस्कार होगा।
इष्ट स्थानीय स्पष्ट परिधि से मन्दकेन्द्र भुजज्या को तथा केन्द्र कोटिज्या को गुणा कर भगणांश ३६० से भाग देने पर क्रम से भुजफल एवं कोटिफल सिद्ध होंगे। भुजफल के चाप का कलादि मान मन्दफल होता है। भूगर्भ से मन्दप्रतिवृत्त स्थित ग्रह पर्यन्त जाने वाला सूत्र मन्दकर्ण होता है। दृश्य ग्रह की स्थिति प्रतिवृत्त में तथा मध्यम ग्रह की स्थिति कक्षा वृत्त में होती है। कक्षा वृत्त और प्रतिवृत्त के केन्द्रों एवं परिधि को स्पर्श करने वाली ऊर्ध्वधि: रेखा को नीचोच्च सूत्र कहा जाता है। भूगर्भ से दृश्य ग्रह तक जाने वाले सूत्र और कक्षा वृत्त के सम्पात विन्दु पर मन्दस्पष्ट ग्रह होता है। दृश्य ग्रह से नीचोच्च रेखा के समानान्तर कक्षा वृत्तव्यास पर लम्ब रूप रेखा का सम्पात विन्दु वक्षावृत्त में मध्यम ग्रह होता है। मध्यम और मन्द स्पष्ट ग्रह का अन्तर मन्दफल होता है।
मकरादि (मकर राशि के आरम्भ से मिथुन राशि के अन्त तक) छ राशियों में यदि शीघ्रकेन्द्र हो तो शीघ्रकोटिफल का त्रिज्या में धन संस्कार करने से (अर्थात्‌ त्रिज्या + शीघ्रकोटिफल) तथा कर्कादि (कर्क राशि के आरम्भ से धनु राशि के अन्त पर्यन्त) छ: राशियों में शीघ्र केन्द्र हो तो शीघ्रकोटिफल का त्रिज्या में रण संस्कार (अर्थात्‌ त्रिज्या - शीघ्रकोटिफल) करने से स्पष्ट शीघ्रकोटि होती है। शीघ्र भुभषफल और शीघ्रकोटि फल के वर्ग योग का वर्गमूल स्फूट शीजघ्रकर्ण होता है।
भुजफल को त्रिज्या से गुणाकर चलकर्ण (शीघ्रकर्ण) से भाग देने पर लब्धि (शीघ्रफलज्या) का चाप (धनु) कलादि शीघ्रफल होता है।
यह शीघ्रफल भौमादि पज्चताणग्रहों के प्रथम और चतुर्थ कर्म (संस्कार) में उपयोगी होता है।
सूर्य और चन्द्रमा को स्पष्ट करने के लिए केवल एक ही मन्दफल संस्कार किया जाता है। शेष भौमादि पज्चतार ग्रहों के लिए संस्कार विधि कह रहा हूँ।
पहले शीघ्रफल पश्चात्‌ मन्दफल पुनः: मन्दफल तदनन्तर शीघ्रफल का संस्कार क्रम एवं अनुक्रम से करना चाहिये। मध्यम ग्रह में पहले शीघ्रफल का आधा तदनन्तर मन्दफल का आधा पश्चात्‌ समग्र मन्दफल एवं समग्र शीघ्रफल का संस्कार किया जाता है।
सूर्यादे सभी ग्रहों के मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र मेषादि ६ राशियों में हो तो मध्यम ग्रह में कलादि मन्दफल और शीघ्रफल का धन संस्कार तथा तुलादि केन्द्र होने पर मध्यम ग्रह में ऋण संस्कार किया जाता है।
सूर्य के भुजफल (मन्दफल) को ग्रहगतिकला से गुणाकर गुणनफल को भचक्रकला (३६० » ६० - २१६०० कला) से भाग देने पर जो कलात्मक लब्धि हो उसे भुजान्तर कहते हैं। उसका संस्कार अभीष्ट ग्रह में सूर्य मन्दफल के अनुसार करना चाहिये। अर्थात्‌ सूर्यमन्दफल धन हो तो ग्रह में लब्धि जोड़ने से मन्दफल ऋण हो तो ग्रह से लब्धि को घटाने से अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट ग्रह होता है।
चन्द्रमा की मन्दोच्चगति से चन्द्रमा की मध्यम गति घटाने से शेष केन्द्र गति होती है। चन्द्र केन्द्र गति से आगे कही गई विधि द्वारा (दोज्यन्तर गुणा इत्यादि) चन्द्रगतिफल का साधन कर चन्द्रमा की मध्यम गति में आगे निर्दिष्ट विधि द्वारा धनऋण करने से चन्द्रमा की स्पष्यगति होती है।
स्पष्ट ग्रहसाधन हेतु जिस प्रकार मन्दफल का साधन किया जाता है उसी प्रकार मन्दगतिफल का भी साधन करना चाहिये। चन्द्रगतिफल साधन में चन्द्रमा की मन्दकेन्द्रगति तथा अन्यग्रहों की मध्यमा गति को गत-गम्य भुजज्याओं के अन्तर से गुणा कर
२२५ से भाग देने पर जो लब्धि प्राप्त हो उसे मन्दपरिधि से गुणाकर भगणांश ३६० से भाग देने पर प्राप्त कलादि लब्धि को कर्कादि केन्द्र होने पर मध्यम गति में जोड़ने (धनसंस्कार) तथा मकरादि केन्द्र होने पर मध्यम गति से घटाने पर ग्रहों की स्पष्टा गति होती है।
ग्रहों की मन्दस्पष्ट गति को अपनी-अपनी शीघ्रोच्चगति से घटाकर शेष को व्रिज्या और अन्त्य कर्ण के अन्तर [{ (९० - शीघ्रफल) - फलकोज्या } ~ अन्त्य कर्ण = शेष ] से गुणाकर चलकर्ण (शीघ्र कर्ण) से भाग देने पर प्राप्त लब्धि शीघ्रगतिफल होती है।
शीघ्रकर्ण यदि त्रिज्या से अधिक हो तो फल धन अल्प हो तो फल ऋण होता है। मन्दस्पष्ट गति में शीघ्र गतिफल का धन ऋण संस्कार करने से स्पष्ट गति होती है। यदि ऋण शीघ्रगतिफल मन्दस्पष्ट गति से अधिक हो तो शीघ्र गतिफल से मन्द स्पष्ट गति को घटाने पर जो शेष रहे वह ग्रह की वक्रगति होती है।
अपने शीघ्रोच्च से दूर (३ राशि अर्थात्‌ ९० से अधिक दूरी पर) स्थित होने पर शीघ्रोच्च रश्मियों के शिथिल हो जाने से अर्थात्‌ शीघ्रोच्चजन्य आकर्षण शक्ति के शिथिल हो जाने पर ग्रह वाम भाग में (अन्य नीच स्थानीय) आकर्षण शक्ति के प्रभाव से आकृष्ट हो कर वक्री हो जाते हैं।
भौमादि ग्रह अपने अपने चतुर्थ शीघ्रकेन्द्र से क्रमश: १६४, १४४, १३०, १६३, तथा ११५ अंशों पर होते हैं तो इनका वक्रगतित्व आरम्भ होता है।
उक्त शीघ्र केन्द्रांशों को चक्र (३६००) में घटाने से अवशिष्ट अंशों के तुल्य ग्रह होने पर ग्रह वक्रगति का त्याग करते हैं अर्थात्‌ मार्गी हो जाते हैं।
मन्दपरिधि की अपेक्षा शीघ्रपरिधि के बड़ी होने से शुक्र और मंगल अपने केन्द्र से सातवीं राशि में, गुरु और बुध आठवीं राशि में, तथा शनि नवम राशि में अपना कक्रत्व त्याग देते हैं।
अहर्गणोत्पन्न भौम शनि और गुरु के पातों में ग्रहवत्‌ शीघ्र फल का संस्कार करना चाहिये। अर्थात्‌ ग्रहस्फुटीकरण में चतुर्थसंस्कार शीघ्रफल को धन हो तो धन, ऋण हो तो ऋण #रने से स्फुट शरसाधनोपयोगी पात होता है। बुध और शुक्र के पातों का तृतीयसंस्कार अर्थात्‌ मन्दफल का विपरीत संस्कार करना चाहिये। यदि ऋण हो तो धन, धन हो तो ऋण करना चाहिये । यहाँ चन्द्रमा के पात का उल्लेख नहीं है अत: चन्द्रमा का गणितगत पात ही ग्राह्म है।
स्पष्ट भौम, गुरु और शनि ग्रहों को अपने अपने संस्कृत पातों से रहित कर ( स्प. ग्रह - प्पात =) शेष की जीवा साधन करनी चाहिये तथा बुध और शुक्र के शीघ्रोच्चों से उनके पातों को घटाकर शेष की जीवा साधन करनी चाहिये। इस प्रकार साधित जीवा, को विक्षेप (परमशर) से गुणाकर गुणनफल में अन्त्य कर्ण (चतुर्थ कर्म में प्रयुक्त होने वाले शीघ्रकर्ण) से भाग देने से कलात्मक लब्धि क्रान्तिसंस्कार योग्य शर होता है। चन्द्रमा के साधन में शीघ्रकर्ण का उपयोग न होने से स्पष्टचन्द्र से पात को घटाकर शेष की जीवा को विक्षेप से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर लब्धि चन्द्रमा का कलात्मक विक्षेप होता है।
विक्षेप (शर) और मध्यमक्रान्ति की एक ही दिशा हो तो विक्षेप और क्रान्ति का योग करने से स्पष्ट क्रान्ति होती है। विक्षेप और क्रान्ति की दिशा भिन्‍न होने पर क्रान्ति और विक्षेप का अन्तर करने से स्पष्ट क्रान्ति होती है। सूर्य की गणितागत (परमापक्रमज्या तु सप्तरन्ध्रगुणेन्द्व: । २८ वें श्छोकोक्‍क्त विधि से प्राप्त) क्रान्ति ही स्फुट क्रान्ति होती है। क्‍योंकि क्रान्ति वृत्त में भ्रमण करने से सूर्य का विक्षेप नहीं होता।
अभीष्ट ग्रह की स्पष्टगत्ति को ग्रहनिष्ठ राश्युदयासुओं (सायन ग्रह जिस राशि पर हो उस राशि के उदयमान) से गुणाकर १८०० से भाग देने पर जो लब्धि प्राप्त हो उसे चक्रकला (२१६०० ) में जोड़ने पर अभीष्ट ग्रह के अहोरात्रासु होते है।
स्फुटक्रान्ति से ज्या (क्रान्तिज्या) और उत्क्रमज्या दोनों का साधन कर त्रिज्या में से उत्क्रमज्या को घटाने से शेष अहोगणात्रवृत्त का व्यासार्द्ध होता है, इसे द्युज्या भी कहते हैं। यह व्यासार्द्ध, दक्षिणक्रान्ति होने पर दक्षिणगोल का, उत्तराक्रान्ति होने पर उत्तरगोल का होता है।
क्रान्तिज्या को पलभा से गुणाकर गुणनफल में १२ का भाग देने पर लब्धि क्षितिज्या (कुज्या) होती है। कुज्या (क्षितिज्या) को त्रिज्या से गुणाकर गुणनफल को अहोगात्र के व्यासार्धरूपी कर्ण (अर्थात्‌ द्युज्या) से भाग देने पर लब्धि चरज्या होती है इसका चाप चर संज्ञक होता है।
उकत चरज्या को चापात्मक बनाने से चरासु होते हैं । उत्तरक्रान्ति होने पर चरासु को अहोरात्रासु के चतुर्थाश में (इनके घट्यात्मक मान को अहोरात्र के चतुर्थाश घटी में) जोड़ने से दिनार्ध तथा घटाने के रात्रय्ध काल होता है। दक्षिण क्रान्ति होने पर विपरीत संस्कार करने से, अर्थात्‌ अहोरात्र के चतुर्थाश में चरघटी के ऋण संस्कार करने से दिनार्ध तथा धन संस्कार करने से रात्र्यर्द्ध मान होता है।
दोनों को द्विगुणित करने पर क्रम से दिनमान और रात्रिमान होते हैं। इसी प्रकार विक्षेप को क्रान्ति में धन ऋण कर (चर साधन द्वारा) नक्षत्रों का दिनरात्रि मान ज्ञात करना चाहिये।
सूर्य और चन्द्र के योग की कलाओं को भभोग ८०० से भाग देने पर लब्धि गत विष्कुम्भादि योग होते हैं। शेष को ६० से गुणा कर रवि चन्द्र के गति योग से भाग देने पर वर्तमान योग का गत-गम्य काल होता है।
अर्थात्‌ शेषकला को ६० से गुणा कर रवि-चन्द्र के गति योग से भाग देने पर भुक्तमान तथा ८०० में शेष कला को घटा कर अवशिष्ट ऐष्य कला को ६० से गुणा कर गति योग से भाग देने पर वर्तमान योग का गम्य (ऐशष्य ) मान होता है।
सूर्य रहित चन्द्रमा की कला को तिथि भोग ७२० कला से भाग देने पर लब्धि गततिथि होती है। शेष को ६० से गुणाकर रवि-चन्द्र गत्यन्तर से भाग देने पर वर्तमान तिथि का गतगम्य मान होता है अर्थात्‌ स्पष्टचन्द्रमा के राश्यादि मान से स्पष्ट सूर्य के राश्यादि मान को घटाकर शेष की कला में ७२० का भाग देने पर लब्धि गत तिथि तथा शेष वर्तमान तिथि की गतकला होती है। गाल को ७२० में घटाने से शेष एष्य कला होती है। गतकला को ६० से गुणाकर रविचन्द्र की गत्यन्तर कला से भाग देने पर गत मान तथा ऐष्य कला को ६० से गुणा कर गत्यन्तर कला से भाग देने पर ऐष्य मान होता है।
कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध से क्रमश: शकुनि, चतुष्पद, नाग, तथा किस्तुध्न ये चार स्थिर करण होते हैं।
तदनन्तर बव आदि सात चर करण होते हैं। एक मास में बवादि करण आठ बार आते हैं
प्रयेक करण का भोगमान तिदथ्यर्ध तुल्य होता है अर्थात्‌ एक तिथि में दो करण होते हैं। इस प्रकार सूर्यादि ग्रहों की स्पष्टगति कही गई।
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धर्म का अन्वेषण
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