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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 38
इष्ट परिधिज्ञानम्‌ ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धृता । युग्मवृत्ते धनर्ण स्यादोजादूनेड्धिके स्फूटमू ॥ ३८
विषम और समपदान्त की मन्द अथवा शीघ्र परिधियों के अन्तर को मन्दकेन्द्र या शीकघ्रकेन्द्र की भुजज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर प्राप्त लब्धि को समंपदान्त परिधि में धन ऋण करने से स्फूट परिधि होती है। यदि केन्द्र समपदान्त में हों और विषमपदान्त की परिधि से समपदान्त की परिधि अल्प हो तो लब्ध फल का समपदान्त परिधि में धन संस्कार अधिक होने पर ऋण संस्कार होगा।
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