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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 3
प्रवहाख्यो मरुत्‌ तांस्‍्तु स्वोच्चाभिमुखमीरयेत्‌ । पूर्वापरापकृष्टास्ते गतिं यान्ति पृथगविधाम्‌ ॥
प्रबह नामक वायु (सूर्यादि) ग्रहों को उनके उच्चों की तरफ प्रेरित करती है (ढकेल देती हैं)। पूर्व और पश्चिम की ओर खिनचें हुये ग्रहों की भिन्न-भिन्न गति होती जाती है।
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