उक्त शीघ्र केन्द्रांशों को चक्र (३६००) में घटाने से अवशिष्ट अंशों के तुल्य ग्रह होने पर ग्रह वक्रगति का त्याग करते हैं अर्थात् मार्गी हो जाते हैं।
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