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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 50
ग्रहाणां शीघ्रगतिफलानयनम्‌ मन्दस्फुटीकृतां भुक्तिं प्रोज्यय शीघ्रोच्च भुक्तित: । तच्छेषं विवरेणाथ हतन्यातू त्रिज्यान्त्यकर्णयो:॥
ग्रहों की मन्दस्पष्ट गति को अपनी-अपनी शीघ्रोच्चगति से घटाकर शेष को व्रिज्या और अन्त्य कर्ण के अन्तर [{ (९० - शीघ्रफल) - फलकोज्या } ~ अन्त्य कर्ण = शेष ] से गुणाकर चलकर्ण (शीघ्र कर्ण) से भाग देने पर प्राप्त लब्धि शीघ्रगतिफल होती है।
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